“Kandali Ki Sabzi उत्तराखंड का एक बेहद स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक पारंपरिक व्यंजन है।”पहाड़ी कंडाली (बिच्छू घास) की सब्जी

तैयारी का समय: 15-20 मिनट | पकने का समय: 20 मिनट | सर्विंग: 4 लोग

“Kandali Ki Sabzi”सामग्री:

आधुनिक तरीका (प्याज-टमाटर के साथ)”

कंडाली (बिच्छू घास): 500 ग्राम (अच्छी तरह से धुली हुई और कटी हुई)

सरसों का तेल: 2 बड़े चम्मच

जख्या या जीरा: 1 छोटा चम्मच (तड़के के लिए)

सूखी लाल मिर्च: 2-3

लहसुन: 8-10 कलियाँ (बारीक कटी हुई)

प्याज: 1 बड़ा (बारीक कटा हुआ)

टमाटर: 1 (बारीक कटा हुआ)

मसाले: नमक (स्वादानुसार), हल्दी पाउडर, धनिया पाउडर, और थोड़ा सा गरम मसाला।

अतिरिक्त: 1 चम्मच बेसन (सब्जी को गाढ़ा और स्वादिष्ट बनाने के लिए) मेरे घर में बेसन नहीं होता है तो थोड़ा आटा डाल देते हैं मुझे अच्छी लगती हैं आप चाहें तो डाल सकते हैं अगर बेसन नहीं भी है तो

“Kandali Ki Sabzi”बनाने की विधि (स्टेप-बाय-स्टेप):

1. कंडाली की सफाई: सबसे पहले कंडाली को चिमटे से पकड़कर धोएं। इसे हल्का उबालें (blanch करें) ताकि इसका डंक (sting) खत्म हो जाए। पानी निथार लें और इसे हल्का दरदरा पीस लें या चाकू से बारीक काट लें।

  1. “Kandali Ki Sabzi”

2. तड़का: कड़ाही में सरसों का तेल गर्म करें। जब धुआं उठने लगे, तो जख्या या जीरा डालें। अब इसमें सूखी लाल मिर्च और बारीक कटा हुआ लहसुन डालें। लहसुन को सुनहरा होने दें।

3. मसाले और सब्जियां: कटा हुआ प्याज डालें और हल्का गुलाबी होने तक भूनें। अब टमाटर और नमक-हल्दी-धनिया पाउडर डालें। टमाटर के गलने तक पकाएं।

4. मुख्य प्रक्रिया: अब इसमें तैयार की हुई कंडाली डालें। इसे अच्छे से चलाएं।

5. बेसन का ट्विस्ट: 1 चम्मच बेसन को थोड़े से पानी में घोलकर ऊपर से डालें। इससे सब्जी में एक अच्छी बाइंडिंग (बनावट) आएगी और स्वाद बढ़ जाएगा।

6. दम: धीमी आंच पर 5-7 मिनट तक ढंककर पकने दें। आखिर में गरम मसाला छिड़कें।

टिप (जरुरी एडवाइस):

हैंडलिंग: कंडाली को साफ करते समय हमेशा ग्लव्स या चिमटे का उपयोग करें। उबलने के बाद यह पूरी तरह सुरक्षित हो जाती है।

प्रेजेंटेशन: इसे गरमा-गरम (चावल ) के साथ परोसें।

परंपरागत तरीका (बिना प्याज-टमाटर)

उत्तराखंड पहाड़ी पूर्वजों की पारम्परिक विधी:

“असली पहाड़ी कंडाली की सब्जी: बिना मसालों के जादू” या “पारंपरिक कंडाली: मेरे गाँव के किचन का एक खास स्वाद”।

“आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम स्वाद के नाम पर न जाने क्या-क्या डाल देते हैं, लेकिन कंडाली की असली पहचान इसके प्राकृतिक स्वाद में है।

मेरे घर व गांव में कंडाली की सब्जी में न प्याज डलता है, न टमाटर और न ही कोई बाजारू मसाला। हम बस शुद्ध सरसों का तेल, सूखी लाल भूटटी हुयी मिर्च और अपने स्वाद के अनुसार नमक का उपयोग करते हैं।

यकीन मानिए, जब यह लोहे की कड़ाही में भूनकर और अपने घर के चावल का मांड और थोड़ा आटा या बेसन डालकर भुट्टी हुयी लाल मिर्च के साथ तैयार होती है, तो इसका स्वाद किसी भी फाइव-स्टार डिश से कहीं ज्यादा संतोषजनक होता है

1. कंडाली (बिच्छू घास) का इतिहास (History)

  1. कंडाली या ‘बिच्छू घास’ हिमालयी क्षेत्रों का एक प्राचीन और पारंपरिक भोजन रहा है।

2. हिमालय के दुर्गम इलाकों में रहने वाले लोग इसे पीढ़ियों से एक प्राकृतिक सुपरफूड के रूप में उपयोग करते आए हैं।

3. हमारे पूर्वजों के लिए यह केवल एक सब्जी नहीं, बल्कि कठिन समय में पोषण का एक मुख्य स्रोत थी।

2. कंडाली की खासियत (Specialty)

  1. इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका ‘प्राकृतिक और शुद्ध स्वाद’ है, जिसे मसालों की जरूरत नहीं होती।

2. यह हिमालय के शुद्ध वातावरण में स्वतः उगती है, इसलिए यह पूरी तरह से ऑर्गेनिक और केमिकल-मुक्त होती है।

3. कंडाली खाने के फायदे (Health Benefits)

  1. पाचन के लिए उत्तम: यह पाचन तंत्र को मजबूत बनाती है और शरीर को अंदर से डिटॉक्स (साफ) करने में मददगार मानी जाती है।

2. औषधीय गुण: कंडाली आयरन और विटामिन से भरपूर होती है, जो शरीर में खून की कमी को दूर करने में मदद करती है।

3. प्राकृतिक ऊर्जा: यह शरीर को भरपूर ऊर्जा प्रदान करती है, इसीलिए इसे पहाड़ी क्षेत्रों में मेहनत करने वाले लोगों का प्रमुख भोजन माना जाता है।

कंडाली की तासीर गर्म होती है, इसलिए हमारे पहाड़ों में इसे मुख्य रूप से सर्दियों के मौसम में खाया जाता है। यह शरीर को अंदर से गर्माहट देने के साथ-साथ सर्दियों में होने वाली छोटी-मोटी बीमारियों से लड़ने में भी मदद करती है। यही वजह है कि पारंपरिक रूप से इसे सर्दियों के आहार में शामिल करना हमारे बुजुर्गों की एक समझदारी भरी परंपरा रही है।”

प्रकृति ने हमें कंडाली जैसा उपहार दिया है, बस इसे सही तरीके से बनाने की कला हमें आनी चाहिए।’

jhangora ki kheer